Monday 12 May 2014

रंग बिरंगी

चलो लग जाओ सब फिर से अपने अपने काम में 
रात देर से घर लौटने वाली गरीब घर की कामकाजी लड़कियों 
वापस लौट आओ सपनों से 
और फिर तैयार रहो किसी दुपाये जानवर के आघात से  
अब भी कुछ बदला नहीं है 
रोज ईंटा ढोकर गुड़ रोटी खाने वालों 
सोच समझ के बीमार पड़ना 
या देख समझ के आना किसी ट्रक के नीचे 
अब भी किसी ढंग के अस्पताल में कोई जगह नहीं है तुम्हारे लिए 
लगा दो छोटे लड़के को फिर किसी पंचर बनाने की दूकान पे 
और छोड़ दो ये ख़याल कि अफसर बनेगा वो  
ढंग के स्कूल अभी भी नहीं हैं उसके लिए 
मनरेगा में फावड़े चलाओ कुछ दिन तो पेट भरेगा 
न हो ठीक से फसल सूखे में तो खा लेना जहर 
कौन बड़ा मंहगा मिलता है 
बिटिया को रौंद दे कोई दरिंदा तो  दुआ करना कि वो मर ही जाए 
या तो शर्म से या फिर सरकारी अस्पतालों की मेहरबानी से 
कुछ नहीं बदला है अभी भी तुम्हारे लिए 
मेला लगा था चार दिन का 
परजा तंतर का रंगीन मेला 
सजी थीं बड़ी बड़ी दुकाने 
खड़े थे हरकारे जगह जगह 
हाथ जोड़े सजाये रहे दुकाने 
सब हो चुका व्यापार 
हो चुकी कमाई जो जो करने निकले थे 
ख़तम हो गया सब तमाशा अब लौट आओ 
रंग बिरंगे सपने देख लिए बहुत तुमने 
अब तो मर ही रहो जो स्बर्ग देखना हो तो 
और कोई चारा न है और न था कभी 
मन तो नहीं करता है इसके आगे सोचने का 
लेकिन दिल है कि मानता नहीं ये कहने से 
कि और न कभी होगा