Saturday 26 September 2009

तमन्नाओं के पर कतर दो
आहों को बेअसर कर दो

चलो कर दो रवाना कारवाँ
फ़िर रहजनो को खबर दो

भूखमरी से बच रहे ढीठ
चलो अब उनको जहर दो

जिन्हें दीखता नहीं हुस्न
इश्क की उन्हें नज़र दो

आवाम की भी मानो तो
एक सियासत लचर दो

कन्धें नाजुक हैं लोगों के
हमे घर मे दफ़न कर दो

Friday 25 September 2009

कुछ काम का नहीं मेरे हुये न तुम
कुछ काम का नहीं मेरे हुये जो तुम

मुद्दतों बैठे रहे हम राह देखते तेरी
ऒर पहलू मे मुद्दतों बैठे रहे हो तुम

रुकते नहीं किसी के लिये ऎ वक्त
क्यूँ मेरे लिये ही ठहर गये हो तुम

कुछ भी मेरा नहीं जब दुनिया में
क्यूँ ऐ दर्द फ़िर मेरे हुये हो तुम

हम अब भी गुनाह करते हैं अदम
यही राह आदमी को दे गये हो तुम

Thursday 24 September 2009

अब दे दे

कुछ आँसू बहें कुछ बात चले
कुछ बाती बनकर जल जाये
कुछ मोम बने दरिया निकले
कोइ याद बहे कोइ घूँघर बोले
कोइ राग कहे कोइ घूँघट खोले
कोइ गीत सुनाये सुबहों के
कोइ कहीं पपिहा बोले
कोइ लाये सन्देसा कोइ पाती बांचे
कोइ बुलाये कोइ सुलाये
कोइ लोरी गाये कोइ मन का बोले
कोइ आस जगाये कोइ प्यास बढाये
कोइ अपनो का सा अहसास कराये
कोइ छूले दिल के तार सभी
बज़ उठे कोइ सितार कभी
कोइ सपनो को पर दे दे
व्यथा कथा को घर दे दे
कोई सब हो जाने दे
कुछ न कहे बह जाने दे
सब दे दे
रब दे दे
और नही अब इन्तज़ार
अब दे दे
बस रब दे दे

Monday 21 September 2009

माना कि ज़िन्दगी का हासिल मौत है
ऐसा भी क्या कि अभी से मर जाइये

न कुछ और बन पड़े तो रोइये ज़ार ज़ार
घुट घुट के बेकार क्यों कलेजा जलाइये

सर तो जायेगा अभी नहीं तो फ़िर कभी
कुर्बान जाइये किसी पे क्यों बोझा उठाइये

क्या हुआ दिल टूटा काँच की ही चीज़ थी
किरचों पर इन्द्रधनुष फ़िर नया सजाइये

फ़िर होश मे आने को हैं चाहने वाले तेरे
उठिये सँवरिये निकाब रुख से हटाइये

बात अगर मान जायें वो मेरी एक बार
यही कि एक बार बात मेरी मान जाइये

कुछ नहीं मिलता है आसान राहों पर
मुश्किलें न हों अगर तो लौट जाइये

Friday 18 September 2009

रस्म निभाने आ पहुँचे
अपने ही जलाने आ पहुँचे
उनको बुलाने दोस्त मेरे
गैर के घर पे जा पहुँचे
मेरे मरने की मुझको
खबर सुनाने आ पहुँचे
मुझसे पहले मेरे चर्चे
उन के दर पे जा पहुँचे
छोड़ आये थे जो चेहरे
मुझे डराने आ पहुँचे
हम तौबा कर बैठे जब
पीने के बहाने आ पहुँचे

Thursday 17 September 2009

अपना स्वार्थ

ढेर सारे फ़ूल खिले
इस बार मेरे बगीचे मे
भीनी सी खुशबू बिखेरते
लेकिन कोई कैसे भला
अपने ही बगीचे मे
रह सकता है हर वक्त
सो
मैने उठाये खूब सारे फ़ूल
ऒर बाँट आया
गलियों चॊबारों
चॊराहों मैदानो
दुकानों मकानों
अब
मै जहाँ भी होता हूँ
भीनी भीनी खुशबू आती है
हर वक्त.

Tuesday 15 September 2009

मैं ऒर मैं

तुम मेरे हो
तुमसे लगाव मेरा है
तुम्हारी चाहत मेरी है
तुमसे विछोह मेरा है
उसकी तड़प मेरी है
तुम्हारी आस मेरी है
गहन प्यास मेरी है
तुम्हारे दर्द मेरे हैं
तुम्हारे स्वप्न मेरे हैं
लगाव चाहत विछोह तड़प
आस प्यास दर्द ऒर स्वप्न
से सहमा हुआ ये
गुजरता जीवन मेरा है
अनगिनत रंगीन भावनाओं के
बोझ तले दबकर सिसकते हुये
हॊले से सर उठाकर ये
उभरता गीत मेरा है
आश्चर्य!
इसमे तुम्हारा क्या है!